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(अ) शासकीय ललित कलामहाविद्यालय, इन्दौर

इस संस्थान की स्थापना महर्षि डी.डी. देवलालीकर के प्रथम प्राचार्यत्व में होकर राज्य में सन् 1927 में हुई। वर्ष 1927 से 1960 तक यह संस्थान मुंबई के सर जे.जे. स्कूल आॅफ आर्ट से सम्बद्ध रहा।

वर्ष 1960 से नेशनल काउसिंल आॅफ टेक्नीेकल एजुकेशन (भारत सरकार) के पाठ्यक्रम यहाॅ प्रारम्भ किए गये। वर्ष 1986 से यह संस्थान इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से भी सम्बद्ध हो गया तथा अब नेशनल डिप्लोमा के अतिरिक्त बी.एफ.ए. (बैचलर आॅफ फाईन आर्ट) की स्नातक डिग्री विद्यार्थियों को प्रदान की जाने लगी है जिससे उन विद्यार्थियों के लिये मार्ग प्रशस्त हो गया है जो उच्चशिक्षा एम.एफ.ए. आदि के लिये उत्सुक हैं। पारम्परिक एवं आधुनिक कला प्रशिक्षण में इस संस्थान ने सम्पूर्ण भारत के कला जगत में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी अर्जित की है। श्री एम.एफ.हुसैन, श्री रजा, श्री एन.एस. बेन्द्रे, स्व. श्री डी.जे. जोशी एवं श्री श्रेणिक जैन जैसे विश्व विख्यात कला शिरोमणि इस संस्थान से बहुत निकट से जुडे़ रहे हैं तथा वर्तमान में भी कभी-कभी वे संस्थान में आकर विद्यार्थियों एवं षिक्षकों को अपना बहुमूल्य मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।


(ब)शासकीय ललित कलामहाविद्यालय, धार

इस संस्थान की स्थापना धार राज्य के महाराज की प्रेरणा एवं स्वर्गीय फड़के जी के मार्गदर्शन में स्वर्गीय डी.जे. जोशी के प्राचार्यत्व में सन् 1939 में हुई। यह संस्थान सर जे.जे. स्कूल आॅफ आर्ट बंबई से सम्बद्ध रहा तथा सन् 1960 से यहाॅ नेशनल काउसिंल आॅफ टेक्नीकल एजुकेशन द्वारा निर्धारित डिप्लोमा पाठ्यक्रम का अध्यापन कार्य होता रहा। सन् 1986 से नेशनल डिप्लोमा के अतिरिक्त इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से सम्बद्ध होने के पश्चात अब विद्यार्थियों को बी.एफ.ए. (बैचलर आॅफ फाईन आर्ट) की स्नातक डिग्री भी दी जाने लगी है। धार में राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार एवं मूर्तिकार स्वर्गीय श्री फड़के जी का स्टूडियो आज भी एक सुन्दर टेकरी पर स्थित है, जिसने धार शहर का वातावरण कलामय बना दिया जिसका लाभ शासकीय ललित कला संस्थान को भी प्राप्त होता रहता है। धार का शांत एवं सुन्दर वातावरण कला अध्ययन की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है।


(स) शासकीय ललित कला महाविद्यालय, ग्वालियर

गालव ऋषि की तपोभूमि ग्वालियर में सांस्कृतिक परम्पराओं को सुरक्षित करने एवं उसके प्रचार- प्रसार के उद्देश्य से चित्रकला एवं मूर्तिकला के षिक्षण हेतु 1954 में प्रसिद्ध कला गुरू स्वर्गीय श्री डी.डी. देवलालीकर के निर्देशन में ललित कला संस्थान की स्थापना की गई जिसके प्रथम प्राचार्य भी वे स्वयं ही थे।

पूर्व में वर्ष 1958 तक शिक्षारत विद्यार्थी सर जे.जे. स्कूल आॅफ आर्ट में परीक्षा देने बंबई जाया करते थे जहाॅ से जी.डी. आर्ट की पत्रोपाधि (डिप्लोमा) प्राप्त होती थी। श्री एल.एस. राजपूत प्राचार्य काल में सन् 1973 में जब ग्वालियर के सुप्रसिद्ध मूर्तिकार स्वर्गीय श्री मदन भटनागर, के सहयोग से इस संस्थान में मूर्तिकला विभाग की स्थापना की गई। 1986 तक इस संस्थान में मात्र डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित था। इसी वर्ष से सम्बद्धता इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से होने के साथ ही उपाधि पाठ्यक्रम (डिग्री कोर्स) भी संचालित किये जाने लगे। वर्ष 1987-88 से इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से सम्बद्धता होने से बी.एफ.ए. (स्नातक), एम.एफ.ए. की उपाधि दी जाती थी, किन्तु वर्ष 2008 से म.प्र. के ग्वालियर जिले में नवनिर्मित राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर से सम्बद्धता हो गई है। जहाॅ से बी.एफ.ए. एवं एम.एफ.ए. की परीक्षायें संचालित कर डिग्री प्रदान की जा रही है।

यहाॅं के शिक्षकों और अनेक विद्यार्थियों ने इस संस्थान का ही नहीं वरन् नगर एवं प्रदेष के अतिरिक्त देश-विदेश में भी नाम गौरवान्वित किया जिनमें स्वर्गीय श्री डी.डी. देवलालीकर, स्वर्गीय श्री एल.एस. राजपूत, स्व. श्री मदन भटनागर, स्व. श्री विश्वमित्र वासवानी, स्व. डी.पी. षर्मा, श्रीमती राजुल भंडारी के अतिरिक्त यहाॅ के विद्यार्थियों में श्री यूसूफ, श्री मुश्ताक़, श्री रोबिन डेविड, श्री शशिकांत मुण्डी, सुश्री सीमा घुरैया एवं श्री अनिल कुमार के अतिरिक्त कई अन्य ऐसे कलाकार हैं जो निरंतर कलाकर्म कर रहे हैं तथा विश्व स्तर पर ग्वालियर को गौरवान्वित कर रहे हैं।

इस संस्थान को देष के वरिष्ठतम् चित्रकारों एवं मूर्तिकारों जैसे श्री नारायण, श्री श्रीधर बेन्द्रे, श्री मकबूल फिदा हुसैन, श्री सैयद हैदर रजा एवं श्री के.के. हैब्बर, श्री शंखू चैधरी, श्री जगदीश स्वामीनाथन आदि के मार्गदर्शन का गौरव भी प्राप्त हुआ जो उन्होंने समय-समय पर संस्थान आगमन पर प्रदान किया।

(द) शासकीय ललित कला महाविद्यालय, जबलपुर

जबलपुर के मध्य में स्थित शासकीय ललित कला महाविद्यालय का प्रारम्भ वर्ष 1961 में शासकीय पाॅलीटेक्नीक कला निकेतन में कला विभाग के रूप में तत्कालीन प्राचार्य श्री एस.के. दास के प्रयासों से प्रारंभ हुआ। वर्ष 1986 में मध्यप्रदेष शासन के संस्कृति विभाग द्वारा इस कला विभाग को एक स्वतंत्र संस्थान का स्तर प्रदान किया गया और तभी से यह एक स्वतंत्र संस्थान के रूप में संचालित हो रहा है।

चित्रकला विषय के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान स्व. श्री ब्यौहार राममनोहर सिन्हा इस संस्थान के प्रथम प्राचार्य बने। श्री अमृतलाल बेगड़, श्री श्रेणिक जैन, श्री हरि भटनागर, श्री हरि श्रीवास्तव, स्व. श्री विष्णु चैरसिया, स्व. श्री हरिशंकर दुबे, स्व. श्री सुधाकर सोनवलकर के अथक प्रयासों से यह संस्थान, चित्रकला एवं व्यवहारिक कला के अध्यापन का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।

वर्ष 1986 में संस्थान के प्रारम्भ होते ही इसमें चित्रकला एवं व्यवहारिक कला के स्नातक एवं स्नातकोत्तर उपाधि के पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये जो कि इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से सम्बद्ध रहा। वर्ष 2008 से मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले में नवनिर्मित राजामानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर से समबद्धता प्राप्त है और बी.एफ.ए. एवं एम.एफ.ए. की परीक्षा संचालित कर डिग्री प्रदान की जा रही हैं। महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने विश्व स्तर पर जबलपुर को गौरवान्वित किया है।

इस महाविद्यालय में समय-समय पर देश-विदेश के वरिष्ठ चित्रकारों एवं मूर्तिकारों का आगमन निरन्तर होता रहा है और आगे भी होता रहेगा।


(इ) शासकीय संगीत एंव ललित कला महाविद्यालय, खण्डवा

‘‘मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक।
मात्-भूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जाये वीर अनेक।।

श्री दादाजी धूनीवाले एवं संत श्री सिंगाजी महाराज की पावन भूमि खण्डवा।

मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री श्री भगवंतराव मण्डलोई की जन्मभूमि, साहित्कार श्री माखनलाल चतुर्वेदी, श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान एवं श्री रामनारायण उपाध्याय की कर्म-स्थली ‘‘खाण्डव वन‘‘ जो वर्तमान में पूर्व निमाड खण्डवा के नाम से जाना जाता है, जिसके उत्तर में विध्यांचल एवं दक्षिण में सतपुडा पर्वत शिखर सजग प्रहरी की तरह दो किनारों पर खड़े हैं वहीं पूर्व और पश्चिम में पवित्र नर्मदा एवं ताप्ती नदियाॅं खण्डवा की सीमा रक्षा करती है। ‘असीरगढ़ का किला अपनी अद्भुत कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है। संगीतकार एवं अभिनेता किशोर कुमार की जन्मस्थली पर खण्डवा में मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान, श्री श्रीराम तिवारी, तत्कालीन संचालक, संस्कृति संचालनालय, भोपाल, श्रीमती रेनू तिवारी, संचालक, श्रीमती वंदना पाण्डेय, उपसंचालक, संस्कृति संचालनालय, भोपाल के अथक प्रयासों से एवं जिले के लोकप्रिय जनप्रतिनिधी श्री कुवंर विजय शाह, श्री देवेन्द्र वर्मा, विधायक, खण्डवा शहर की प्रथम नागरिक श्रीमती भावना शाह, माहपौर, खण्डवा तत्कालिक जिलाधीश, श्री नीरज दुबे (आई.ए.एस.) के द्वारा एवं आम जनता की संगीत के प्रति रुचि के कारण एवं विषेष आग्रह पर एन.व्ही.डी.ए. परिसर में संगीत एवं ललित कला संस्थान/महाविद्यालय की स्थापना 01 जुलाई, 2013 को की गई। प्रथम वर्ष में ही इस महाविद्यालय में 168 छात्र-छात्राओं ने प्रवेश लिया जो अपने आप में एक उपलब्धि है।


सम्बद्धता

समस्त शासकीय ललित कला महाविद्यालय राजामानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर से सम्बद्ध हैं, जिसमें विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम संचालित है।